करीब 14 लाख रुपये की महिंद्रा एक्सयूवी-500 में निर्माण दोष होने का दावा करते हुए वाहन बदलने और मुआवजा दिलाने की मांग करने वाले उपभोक्ता को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से भी राहत नहीं मिली।

हाई कोर्ट ने जिला उपभोक्ता फोरम, राज्य उपभोक्ता आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के फैसलों को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी वाहन में निर्माण दोष साबित करने के लिए तकनीकी विशेषज्ञ की रिपोर्ट आवश्यक होती है और केवल आरोपों के आधार पर वाहन बदलने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस अर्चना पुरी और जस्टिस रमेश कुमारी की खंडपीठ ने महेंद्र सिंह यादव की याचिका पर यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसने अप्रैल 2012 में गुरुग्राम स्थित स्टर्लिंग मोटर्स से लगभग 14.11 लाख रुपये में महिंद्रा एक्सयूवी-500 खरीदी थी।

वाहन की डिलीवरी मिलने के तुरंत बाद उसमें इंजन से आवाज आने, दरवाजों के लॉक में खराबी, चलते समय दरवाजों के अपने आप खुलने, गियर बॉक्स और चेसिस से आवाज आने जैसी कई समस्याएं सामने आने लगीं।

याचिकाकर्ता के अनुसार, वाहन खरीदने के कुछ ही दिनों बाद एक घटना में कार की खिड़की अपने आप खुल गई, जिसके कारण पीछे से आ रहे मोटरसाइकिल चालक की टक्कर वाहन से हो गई और कार को नुकसान पहुंचा। उसने आरोप लगाया कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद डीलर और कंपनी वाहन की खामियां दूर करने में विफल रहे।

हालांकि अदालत के समक्ष रिकॉर्ड से सामने आया कि वाहन के इंजन से संबंधित शिकायत पर कंपनी ने इंजन बदल दिया था। इतना ही नहीं, इंजन बदलने के बाद 17 दिसंबर 2012 को याचिकाकर्ता ने स्वयं एक ‘संतुष्टि नोट’ पर हस्ताक्षर किए थे। जिला उपभोक्ता फोरम ने भी पाया था कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई तकनीकी या विशेषज्ञ साक्ष्य पेश नहीं कर सका कि वाहन में वास्तव में निर्माण दोष था।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वाहन खरीदने के बाद बहुत कम समय में दो दुर्घटनाओं का शिकार हुआ था और उसके बॉडी पार्ट्स को नुकसान पहुंचा था। ऐसे मामलों में निर्माण दोष और दुर्घटना से उत्पन्न समस्याओं के बीच अंतर स्थापित करने के लिए विशेषज्ञ राय आवश्यक होती है।

हाई कोर्ट ने कहा कि तीनों उपभोक्ता मंचों ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन करते हुए एक समान निष्कर्ष निकाला है कि वाहन में निर्माण दोष साबित नहीं हुआ। जब याचिकाकर्ता स्वयं इंजन बदलने के बाद संतुष्टि व्यक्त कर चुका था और कोई विशेषज्ञ रिपोर्ट भी पेश नहीं की गई, तब न्यायिक हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। इसी के साथ हाई कोर्ट ने याचिका तथा लंबित सभी आवेदनों को खारिज कर दिया।

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